
दूर समन्दर, घर अम्बर का




आज बात खुद की तो, जिन्दगी का रंग नुमाया हो गया |
दौलत न थी मेरे पास तो, अपना ही पराया हो गया ||
कल रात आइना जो देखा तो, एक धुंधली तस्वीर सी दिखाई दी |
आज महफ़िल में गया तो, हकीकत सी दिखाई दी ||
क्या पता मुझे जो, शर्गोशियाँ होती थी मेरे जेहन में ,
जमाने को मेरे खूने-अश्क में भी ,अय्याशियाँ दिखाई दी||
हकीकत कुछ और थी, फसाना कुछ और था ,
रिश्तों की जंग में ,लहू का रंग कुछ और था |
जब बात खुद के लहू की ,हुयी तो पता चला ,
नकाब कुछ और था ,लहू कुछ और था ....||||
जिन्दगी कट रही है.
किसी पेड़ की उस शाख की तरह जो जड़ से कट गयी है... ... ..
रात होती है,
लेकिन बीतती है किसी अनाथ बच्चे की तरह ... ... .
जिन्दगी कट रही है.
किसी पेड़ की उस शाख की तरह जो जड़ से कट गयी है... ... ..
सुबह भी होती है यहाँ पे ..
लेकिन आशा की किरण कोशों दूर होती है .. .....
जिन्दगी कट रही है.
किसी पेड़ की उस शाख की तरह जो जड़ से कट गयी है... ... ..
तने को जब लगती है चोट ...
वो आता है जड़ के समीप , और लगता है सब दुःख दर्द कट गया है ..
लेकिन जब एक टूटी हुई पत्ती पहुचती है तने के पास ... ..
लेने को दो शांस.. ...
तना होता है ..पत्ती भी होती है..
लेकिन .... ...??????
पत्ती तने को छु नही सकती ...
क्यूंकि.. . ..
तने के बिन पत्ती ...पत्ती हो नही सकती... ..?????
जिन्दगी कट रही है.
किसी पेड़ की उस शाख की तरह जो जड़ से कट गयी है... ...